"जो स्वयं को जान लेता है, वह समस्त बंधनों से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप में जागृत हो जाता है।"
📿 प्रतिदिन प्रातः 4 बजे Online Zoom Meditation
|| ऊँ क्रिया बाबाजी नमः ऊँ || ऊँ तैलंग स्वामी तुभ्यं नमः ||
मौन ही स्वयम से साक्षात्कार का एकमात्र मार्ग है,
जो गुरू कृपा से ध्यान अभ्यास में स्वतः ही घटित होता है
7,350+ साधक • ध्यान साधना • आत्मज्ञान
परिचय
मैं राजयोगी, एक साधक और ध्यान-मार्ग का अनुभवी पथिक हूँ। भारत के विभिन्न राज्यों में दीर्घकाल तक ध्यान शिविरों का संचालन किया है और हजारों साधकों को उनके परम-चेतन स्वरूप का परिचय करवाया है।
मेरी शिक्षाएँ किसी ग्रंथ की नकल नहीं — यह प्रत्यक्ष अनुभव की भाषा है। चेतना की स्थिरता, समाधि का मार्ग और आत्मज्ञान — इन्हें मैं आपके जीवन में उतारने का प्रयास करता हूँ।
"स्थिर (ठहरी) हुई चेतना तो स्वयम में ही चेतन है — यह कर्म और इच्छाएं स्वप्न की तरह क्षणिक, नाशवान और आधार रहित हैं।"
आध्यात्मिक डिजिटल पुस्तकालय
राजयोगी जी की आत्मज्ञान एवं साधना-पथ की रचनाएँ
✦ प्रमुख रचना · Featured Book
"वाह रे मन ! तू क्या-क्या नहीं बना! अपनी अनंत इच्छाओं को भोगने के लिए तूने अनेकों अवतार लिए..."
यह पुस्तक आत्मज्ञान, वेदान्त और ध्यान-साधना की एक गहन आध्यात्मिक यात्रा है। इसमें मन की अनंत यात्रा, आत्मा के वास्तविक स्वरूप और स्वयं से मिलने के मार्ग को सरल एवं प्रेरणादायक भाषा में प्रस्तुत किया गया है।
✦ द्वितीय रचना · Second Book
"साधना-पथ के हर प्रश्न का उत्तर — अनुभव की भाषा में, सरल एवं सीधे हृदय तक पहुँचने वाले शब्दों में..."
साधना-पथ के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर — राजयोगी जी के सान्निध्य में प्राप्त ज्ञान पर आधारित यह पत्रिका, जिज्ञासु साधकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। आत्मज्ञान, ध्यान, मोक्ष और जीवन के रहस्यों पर गहन प्रश्नोत्तर संकलन।
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आत्मज्ञान, ध्यान, समाधि, वेदान्त या किसी भी आध्यात्मिक विषय पर अपना प्रश्न पूछें — राजयोगी जी की शिक्षाओं पर आधारित एआई से तत्काल उत्तर पाएँ।
मुख्य शिक्षाएँ
इस बहते हुए जीवन और बहती हुई इच्छाओं में लिप्त चेतना का ठहराव अति आवश्यक है। बिना ठहरे पूर्ण मुक्ति और शांति मिलना संभव नहीं।
जो ईश्वर पर अधिकार बनाते हैं, वही ईश्वर पर अधिकार जता सकते हैं। भाव ही ईश्वर के प्राण हैं, जिससे जीवित होकर ईश्वर कहीं भी और किसी भी स्वरूप में प्रगट हो जाते हैं।
शरीर को साधकर ऐसी स्थिरता में प्रवेश कीजिए कि यह शरीर पाषाण हो जाए, तब नारायण आपके भीतर विराट रूप में प्रगट होंगे और आप नारायण में संपूर्ण सृष्टि को लय होते एवम जन्म लेने का अद्भुत दृश्य देखोगे।
विशेष ज्ञान
ध्यान का अर्थ है — सभी क्रिया-कलापों से मुक्त होकर परमशांति, परमानंद और अखंड ठहराव में स्थित हो जाना। जब आप अपने परम उद्देश्य को जानेंगे, तभी ध्यान में प्रवेश होगा।
जब श्वास-प्रश्वास की गति रुक जाती है, तब साधक के भीतर स्थित मन एवम् विचारों की सृष्टि भी ठहर जाती है — यहीं आत्मज्ञान के द्वार में प्रवेश है।
यह संसार त्रिबंध (प्रारब्ध, नियति और नियम) के आधार पर चलता है। केवल योगी — चेतना से युक्त साधक — इस त्रिबंध से मुक्त होता है।
ध्यान में प्रवेश करना है तो ईश्वर के उदासीन भाव को धारण करना होगा। जिस क्षण आप उदासीन भाव धारण कर विचार रूपी सृष्टि में हस्तक्षेप बंद कर देंगे — आप ईश्वर के दिव्य स्वरूप में प्रवेश कर जाएंगे।
"जो चेतना मूल से ही आनंद और सुख का स्वरूप है, उसका बाहर की ओर आनंद एवम सुख की खोज करना ही अज्ञानता है — जैसे कोई सम्राट चारपाई बिछाने जितनी जगह के लिए अपने ही राज्य में भीख मांग रहा हो।"
— राजयोगी जी
ध्यान प्रशिक्षण
ब्रह्ममुहूर्त ध्यान बैच
प्रतिदिन सुबह 4 बजे से 6 बजे तक — आसन, प्राणायाम और गहन ध्यान साधना। राजयोगी जी के सान्निध्य में ऑनलाइन अभ्यास।
सोमवार रात्रि बैच
साप्ताहिक ध्यान सत्र — प्रत्येक सोमवार रात 8:30 बजे। आपकी स्थिति के अनुसार व्यक्तिगत मार्गदर्शन।
विशेष रात्रि ध्यान बैच (शाम का सत्र)
सोमवार और गुरूवार को विशेष रात्रि ध्यान सत्र — गहन साधना, मन की शांति और आत्मज्ञान की ओर एक और कदम।
व्यक्तिगत मार्गदर्शन
ध्यान की किसी भी समस्या के लिए सीधे संपर्क करें। आपकी साधना की समस्याओं का व्यक्तिगत समाधान।
राजयोगी जी की वाणी
जो अभी वर्तमान में चल रहा है, जिसमें अभी आप इस समय में present हो, जीने वाले तो किसी भी भाव एवं धारणा को धारण कर समय में प्रवेश कर लेते हैं...
आप साधक तो इस क्षण को भी नहीं जी पा रहे हो! जो अभी वर्तमान में चल रहा है, जिसमें अभी आप इस समय में present हो, जीने वाले तो किसी भी भाव एवं धारणा को धारण कर समय में प्रवेश कर लेते हैं और उस बीते हुए भाव को भी जी लेते हैं। आपके भाव बिखरे हुए हैं, आपकी धारणा बिखरी हुई है, आप एक में एकाग्र नहीं हैं, इसलिए आप किसी भी स्वरूप को जी नहीं पाते हैं...
कभी इन संसारिक भावों से बने स्वरूपों का त्याग कर "अहं ब्रह्मास्मि" के भाव को धारण कर तो देखिए, आप निश्चित ही परम शांत एवं आनंद रूप परब्रह्म हो जाओगे।
आनंद को धारण करोगे तो कृष्ण हो जाओगे,
शांति को धारण करोगे तो बुद्ध हो जाओगे,
प्रकृति से ऐक्य का भाव धारण करोगे तो शिव हो जाओगे।
( क्रमशः... )
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